दक्षिण के द्वार में कब से और कितना बैठी है भाजपा, क्यों अब तक अजय है दुर्ग

नई दिल्ली। भारतीय जनता पार्टी ने 2014 में केंद्र की सत्ता हासिल कर इतिहास रच दिया था. इसके बाद से बीजेपी ने देश के अधिकतर राज्यों में या तो अकेले अपने दम पर सरकार बनाई या फिर एनडीए गठबंधन की सरकारें बनीं. लेकिन दक्षिण भारत का दुर्ग जीतने में बीजेपी को अभी तक सफलता नहीं मिल पाई है।

मोदी युग में बीजेपी ने ऐसे कई राज्यों में जीत की पताका लहराई है, जहां पहले कभी पार्टी सत्ता में नहीं रही. जैसे असम और त्रिपुरा जैसे राज्यों में बीजेपी पहली बार अकेले अपने दम पर बहुमत के साथ सत्ता में आई. वहीं, हरियाणा और झारखंड जैसे राज्यों में भी बीजेपी का मुख्यमंत्री गद्दी पर बैठा. हालांकि, इसी दौरान कर्नाटक को छोड़कर बीजेपी दक्षिण भारत के किसी भी राज्य में अपनी पैठ नहीं बना पाई।

दक्षिण भारत देश का ऐसा हिस्सा है, जहां बीजेपी को सत्ता में आने के लिए अभी लंबा सफर तय करना है. यही वह सवाल है जिसके बारे में बीजेपी सोच रही है, जिससे कि न सिर्फ पार्टी का आधार मजबूत हो सके बल्कि लोकसभा चुनाव 2024 में (कर्नाटक को छोड़कर) ठीक-ठाक सीटें भी जीत सके।

इस रिपोर्ट में हमने दक्षिण के छह राज्यों आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल, पुडुचेरी, तमिलनाडु और तेलंगाना में बीजेपी के जनाधार का विश्लेषण किया है. इन राज्यों में बीजेपी के जनाधार पर विश्लेषण के लिए हमने दो बिंदुओं पर फोकस किया है. ये दो बिंदु हैं- पहला इन राज्यों में बीजेपी का वोट शेयर और इन राज्यों की जिन सीटों पर बीजेपी ने चुनाव लड़ा है, वहां पर पार्टी का वोट प्रतिशत।

हम सबसे पहले शुरुआत आंध्र प्रदेश से करेंगे।

आंध्र प्रदेश

आंध्र प्रदेश दक्षिण भारत का वह राज्य है, जहां 1990 के दशक में बीजेपी को टीडीपी के रूप में एक कद्दावर का राजनीतिक सहयोग मिला. चंद्रबाबू नायडू वे नेता थे जिन्होंने 1990 के दशक में खुलकर बीजेपी का समर्थन किया था. टीडीपी अटल सरकार के दौरान एनडीए का हिस्सा थी. टीडीपी मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में भी एनडीए का हिस्सा रही थी।

बीते कुछ सालों में आंध्र प्रदेश विधानसभा चुनाव आम चुनावों के साथ ही हुए हैं. आंध्र प्रदेश में बीजेपी का जनाधार कम रहा है लेकिन टीडीपी से गठबंधन की वजह से बीजेपी ने कम सीटों पर चुनाव लड़े लेकिन 2014 में चार विधानसभा सीटें और दो संसदीय सीटें जीतने में कामयाब रही. 2014 विधानसभा चुनाव में बीजेपी का वोट शेयर दो फीसदी और लोकसभा चुनाव में सात फीसदी रहा।

हालांकि, 2019 के विधानसभा चुनाव और लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने आंध्र प्रदेश में अकेले सभी सीटों पर चुनाव लड़ा था और विधानसभा और लोकसभा दोनों ही चुनावों में पार्टी का वोट प्रतिशत एक फीसदी से भी कम रहा था. इन दोनों चुनावों में बीजेपी अपना खाता तक नहीं खोल सकी थी।

नीचे दिए चार्ट से समझा जा सकता है कि लंबे समय से टीडीपी का साझेदार रहने के बावजूद बीजेपी राज्य में टीडीपी की छत्रछाया के बाहर नहीं निकल सकी अपना जनाधार मजबूत करने में कामयाब नहीं हो पाई है. 2024 के लोकसभा चुनाव में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या बीजेपी एक बार फिर आंध्र प्रदेश में अपने दम पर चुनाव लड़ेगी या फिर अपनी सीटें बढ़ाने के लिए किसी साझेदार को ढूंढेगी ?

तेलंगाना

तेलंगाना में इस साल के अंत में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं. कभी आंध्र प्रदेश का हिस्सा रहा तेलंगाना लंबे भाषायी विवाद के बाद 2014 में अलग राज्य बन गया था. तेलंगाना के मुख्यमंत्री केसी राव के नेतृत्व में तेलंगाना राष्ट्रीय समिति (अब भारत राष्ट्रीय समिति) लंबे समय से इस आंदोलन की अगुवाई कर रहे थे. तेलंगाना के गठन के बाद से वह राज्य की सत्ता संभाल रहे हैं. आंध्र प्रदेश की तरह तेलंगाना की सियासत में भी बीजेपी की कोई बड़ी भूमिका नहीं है।

2014 के बाद से तेलंगाना में बीजेपी की परफॉर्मेंस आंध्र प्रदेश की तरह ही रही है. तेलंगाना विधानसभा चुनाव में बीजेपी का वोट प्रतिशत 7 फीसदी और लोकसभा चुनाव में 10 फीसदी रहा है. बीजेपी का टीडीपी से गठबंधन रहा है. 2014 में राज्यवार वोट प्रतिशत की तुलना में बीजेपी का सीटों पर वोट प्रतिशत अधिक रहा है. विधानसभा चुनाव में बीजेपी का वोट प्रतिशत 19 फीसदी जबकि लोकसभा चुनाव में 23 फीसदी रहा।

2018 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने अकेले चुनाव लड़ा था और उसका वोट प्रतिशत महज सात फीसदी था. हालांकि 2019 के लोकसभा चुनाव में तेलंगाना में बीजेपी का वोट प्रतिशत में इजाफा हुआ और ये बढ़कर 19 फीसदी पहुंच गया था. इसके बाद से राज्य में बीजेपी की परफॉर्मेंस में लगातार सुधार हो रहा है. बीजेपी ने 2020 में हुए हैदराबाद नगर निगम चुनाव में राजनीतिक पंड़ितों को चौंका दिया था. इस चुनाव में न सिर्फ पार्टी ने अच्छे खासे वोट बटोरे थे बल्कि वोट प्रतिशत और सीट शेयरिंग के हिसाब से वह दूसरे स्थान पर रही थी।

तेलंगाना में हाल ही में विधानसभा उपचुनाव में बीजेपी ने सत्तारूढ़ टीआरएस को कड़ी टक्कर दी थी और मुख्य प्रतिद्वंदी बनकर उभरी. इस प्रक्रिया में बीजेपी ने उसी कांग्रेस को पीछे छोड़ दिया जिसने आंध्र प्रदेश से तेलंगाना को अलग करने की प्रक्रिया शुरू की थी. अब यह तो समय बताएगा कि हैदराबाद नगर निगम और उपचुनाव में बीजेपी ने जो रफ्तार पकड़ी है, वह उसे बरकरार रख पाती है या नहीं? लेकिन अगर बीजेपी तेलंगाना में चौंकाने वाले नतीजे देती है तो कर्नाटक के बाद दक्षिण भारत के एक और राज्य में बीजेपी के जनाधार का विस्तार होगा।

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